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जागो मोदी प्यारे जागो, इससे पहले कि देर हो जाए

अभिरंजन कुमार

मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी के शुरुआती चंद महीनों में ही उपरोक्त चार काम ऐसे कर दिये, जिससे लगा कि ऐसी शानदार और मजबूत इच्छाशक्ति वाली सरकार भारत में पहले कभी नहीं बनी।

1. जम्मू कश्मीर से एक झटके में धारा 370 ख़त्म कर राज्य का पुनर्गठन कर देना
2. करोड़ों मुस्लिम बहनों को न्याय दिलाने के लिए तीन तलाक की व्यवस्था को गैरकानूनी बना देना
3. सुप्रीम कोर्ट को राम मंदिर मुद्दे पर तेज़ी से सुनवाई करके जल्द से जल्द न्यायसम्मत फैसला देने के लिए प्रेरित करना
और
4. नागरिकता संशोधन कानून के द्वारा पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का फैसला करके मानवता का मस्तक ऊंचा करना;

मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी के शुरुआती चंद महीनों में ही उपरोक्त चार काम ऐसे कर दिये, जिससे लगा कि ऐसी शानदार और मजबूत इच्छाशक्ति वाली सरकार भारत में पहले कभी नहीं बनी।
लेकिन फिर शुरू हुआ नागरिकता संशोधन कानून का विपक्ष प्रायोजित विरोध। और इसके बाद से न जाने क्यों और कैसे मोदी सरकार की बुद्धि बिला गई। अपने फौलादी इरादों के लिए जानी जाने वाली यह सरकार अचानक बेहद कमज़ोर नज़र आने लगी।
1. माहौल दिन-ब-दिन खराब हो रहा था, हम लोग भी लगातार आशंका जता रहे थे कि देश को दंगों की आग में झोंकने की साज़िश हो रही है। फिर भी सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और देखते-देखते दिल्ली में दंगा हो गया। 50 से अधिक लोग मारे गए और साढ़े पांच साल तक दंगारहित सरकार चलाने का खुद मोदी प्रशासन का सिलसिला टूट गया।

2. कोरोना को लेकर बरती जा रही सावधानियों और एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग के तमाम दावों के बीच न जाने कैसे सैकड़ों तबलीगी आतंकवादी विदेशों से भारत आ गए। आ ही नहीं गए, दिल्ली में कई दिनों तक अन्य सैंकडों लोगों को संक्रमित किया और फिर पूरे देश में अलग-अलग जगहों पर छितरा गए। फिर अन्य हज़ारों लोगों को संक्रमित करके यह सुनिश्चित कर दिया कि अब इस देश में कोरोना के प्रसार को कोई माई का लाल नहीं रोक सकता। जब तक तबलीगी आतंकवादी दिल्ली में थे, तब तक उन्हें जगह खाली करने का नोटिस दिया जा रहा था और जब वे पूरे देश में छितरा गए, तो जैसे साँप निकल जाने के बाद लाठी पीटी जा रही थी।

3. फिर भारत में कोरोना को फैलाने का कलंक तबलीगी आतंकवादियों के माथे से हटाने और कोरोना प्रसार की धीमी गति को तेज़ करने के इरादे से मज़दूरों के इर्द-गिर्द साज़िशों का जाल बुना गया, लेकिन सरकार इस जाल में भी फंसती चली गई। जगह-जगह मज़दूरों का मजमा लगाए जाने की साज़िशों के बीच पहले 40-50 दिन तो सरकार ने उन्हें वहीं रोकने का प्रयास किया, जहाँ वे थे, लेकिन इसके बाद घुटने टेकते हुए मज़दूरों को गांव-गांव तक पहुंचाने की मुहिम छेड़ दी गई। महानगरों में कोरोना से मज़दूरों की मौत होती या नहीं होती, पर रेल पटरियों पर, सड़कों पर, श्रमिक स्पेशलों में उनकी मौत ज़रूर दिखाई देने लगी। अंततः अब वे संक्रमित होकर भी मर रहे हैं और गाँव-गाँव तक अन्य लोगों की मौत का कारण भी बन रहे हैं। कोई बताए मुझे कि देश भर में मजदूरों के प्रति फ़र्ज़ी संवेदना का जो तूफ़ान पैदा किया गया, आखिरकार उससे मज़दूरों का कितना भला हुआ है? या कहीं उल्टे उन्हें और देश दोनों को नुकसान ही तो नहीं हो गया है?

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4. आखिरकार कोरोना फैल गया और विपक्षी प्रोपगंडा के कारण 20 लाख करोड़ का पैकेज भी आ गया। लेकिन इस पैसे के भी पानी में जाने की पूरी आशंका दिखाई दे रही है। न तो यह पता चल पा रहा है कि देश कोरोना से कैसे निकलेगा, न ही यह पता चल पा रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था कैसे गति पकड़ेगी। प्याज़ भी खाया कोड़े भी खाये, आगे न जाने क्या होगा हाये!
जब से मैंने होश संभाला है, मोदी सरकार जितना जनता का विश्वास और समर्थन अन्य किसी सरकार को हासिल नहीं था। इससे पहले 1984 में राजीव गांधी को ज़रूर अपार बहुमत मिला था, लेकिन उस चुनाव में प्रजातंत्र के नागरिकों ने नहीं, बल्कि राजतंत्र के गुलामों ने वोट डाले थे। जनता ने तब लोकतंत्र के मायने समझकर या अपने अधिकार और कर्त्तव्य समझकर या गुण-दोषों का विश्लेषण करके वोट नहीं डाले थे, बल्कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में जो उन्माद पैदा हुआ था, उसी के कारण हज़ारों सिखों का भी कत्लेआम हुआ और उसी के कारण विपक्ष की भी धज्जियां उड़ गयीं।

ऐसे में जब इतने व्यापक लोकतांत्रिक समर्थन के बावजूद मोदी सरकार को इतनी कमज़ोरी से परफॉर्म करते हुए देख रहा हूँ तो बड़ी हैरानी हो रही है।
1. क्या यह सरकार एन्टी-सीएए प्रोटेस्ट के बाद से डर गई है और बैकफुट पर आ गई है?
2. क्या यह सरकार भी विभिन्न समूहों के तुष्टीकरण में जुट गई है?
3. या इस सरकार ने मुद्दों को मजबूती से हल करने का अपना आत्मविश्वास खो दिया है?
4. क्या यह सरकार भी अंततः धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के कांग्रेसी प्रपंच में ही उलझ गई है?
5. क्या इस सरकार ने भी अंततः मजदूर बनाम गैर-मज़दूर की अराजकतावादी और विभाजनकारी वामपंथी लाइन पर ही चलने का फैसला कर लिया है?
ये सारे सवाल इसलिए उठा रहा हूँ, क्योंकि एंटी-सीएए प्रोटेस्ट, तबलीगी आतंकवादियों, कोरोना की रोकथाम और मासूम मजदूरों की समस्याओं को जिस तरह से हैंडल किया है, उससे मुझे गहरी निराशा हुई है। हम 56 इंच की छाती वाली मज़बूत सरकार देखना चाहते हैं।
इसलिए जागो मोदी प्यारे जागो, इससे पहले कि देर हो जाए।लेटर लिखकर शो पर बैन लगाने की भी मांग की है।

(वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)
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