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महाराष्ट्र सरकार में सामने आ रहे मतभेद, सामना ने कांग्रेस को याद दिलाई हैसियत

This News was published on: 12:27 PM

मुंबई। शिवसेना के मुखपत्र सामना ने महा विकास आघाडी में नाराजगी पर कांग्रेस (Congress) पर तंज कसा है और इस बात को लेकर चेताया है कि सीएम ठाकरे कुर्सी के लालची नहीं हैं, जो वो कोई भी शर्त मान लें.

सामना के लेख में विधानसभा में कांग्रेस के संख्याबल को याद दिलाकर उनकी महाविकास आघाडी में हैसियत क्या है, यह याद दिलाया गया है. कांग्रेस के पास सबसे कम यानी 44 विधायक हैं. इसके अलावा लेख में कहा गया है कि कांग्रेस को मंत्री पद मिले क्योंकि शिवसेना ने त्याग किया.

वहीं अब सामना के लेख पर बीजेपी ने भी सियासी वार किया है. बीजेपी नेता राम कदम ने कहा है कि मुंबई में आदमी कोरोना के बेड ना मिलने के कारण तड़प-तड़प कर मर रहा है और इन तीनों पार्टियों को कुर्सी की पड़ी है.

सामना संपादकीय जिसका शीर्षक है खटिया क्यों चरमरा रही है?..में लिखा गया है, ‘जब उद्धव ठाकरे छह महीने पहले मुख्यमंत्री बने तो महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे देश में उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया. उस दौरान जिनके पेट में दर्द था, उन लोगों ने पूछा था कि क्या यह सरकार एक महीने भी चल पाएगी? लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. होने की संभावना भी नहीं है. सरकार ने छह महीने का चरण पूरा कर लिया है. तीन विविध विचारधारा वाले दलों की सरकार बनी.

उस सरकार की बागडोर सर्वसम्मति से उद्धव ठाकरे को दी गई. राज्य के मामले में मुख्यमंत्री का निर्णय ही अंतिम होता है, ऐसा तय होने के बाद कोई और सवाल नहीं रह जाता. शरद पवार ने खुद इसका पालन किया है. वे समय-समय पर मुख्यमंत्री से मिलते रहते हैं. उनका अनुभव शानदार है. तदनुसार वे राज्य के संबंध में कुछ सुझाव देते हैं. कांग्रेस पार्टी भी अच्छा काम कर रही है, लेकिन समय-समय पर पुरानी खटिया रह-रह कर कुरकुर की आवाज करती है. खटिया पुरानी है लेकिन इसकी एक ऐतिहासिक विरासत है. इस पुरानी खाट पर करवट बदलने वाले लोग भी बहुत हैं.

इसलिए यह कुरकुर महसूस होने लगी है. मुख्यमंत्री ठाकरे को आघाडी सरकार में ऐसी कुरकुराहट को सहन करने की तैयारी रखनी चाहिए. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बालासाहेब थोरात का कुरकुराना संयमित होता है. घर में भाई-भाई में झगड़ा होता है. यहां तो तीन दलों की सरकार है. थोड़ी बहुत कुरकुर तो होगी ही. ‘मुख्यमंत्री से मिलकर बात करेंगे’ थोरात ने ऐसा कहा. उसी खाट पर बैठे अशोक चव्हाण ने भी ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को एक साक्षात्कार दिया और उसी संयम से कुरकुराए, ‘सरकार को कोई खतरा नहीं है, लेकिन सरकार में हमारी भी बात सुनी जाए. प्रशासन के अधिकारी नौकरशाही विवाद पैदा कर रहे हैं.

हम मुख्यमंत्री से ही बात करेंगे!’ अब ऐसा तय हुआ है कि कुरकुर की आवाज वाली खाट के दोनों मंत्री महोदय मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी बात कहनेवाले हैं. मुख्यमंत्री उनकी बातें सुनेंगे और निर्णय लेंगे. लेकिन कांग्रेस क्या कहना चाहती है? राजनीति की यह पुरानी खटिया क्यों कुरकुर की आवाज कर रही है? हमारी बात सुनो का मतलब क्या? यह भी सामने आ गया है. थोरात और चव्हाण दिग्गज कांग्रेसी नेता हैं, जिन्हें सरकार चलाने का बहुत बड़ा अनुभव है.हालांकि, उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस तरह का दीर्घ अनुभव शरद पवार और उनकी पार्टी के लोगों को भी है. हालांकि कुरकुर या कोई आहट होती नहीं दिख रही.

प्रशासन के कुछ अधिकारी ऐसा व्यवहार कर रहे हैं मानो वे ही प्रभारी हैं और वे कांग्रेस नेताओं के साथ उचित व्यवहार नहीं कर रहे हैं, ऐसी खबरें प्रकाशित हुई हैं. मुख्य सचिव अजोय मेहता और नागपुर के मनपा आयुक्त तुकाराम मुंढे के कामकाज को लेकर शिकायतें की जा रही हैं, लेकिन अधिकारी कितना भी ‘बड़ा’ क्यों न हो, वह सरकार के सेवक के रूप में मुख्यमंत्री के आदेशों का पालन करता है. मुख्य सचिव को लगातार विस्तार मिल रहा है. इसलिए शिकायत है कि प्रशासन में अन्य अधिकारियों के बीच अशांति है. इस पर चर्चा की जा सकती है, लेकिन किसी भी अवैध या गैरकानूनी गतिविधियों के बारे में प्रशासन की कोई शिकायत नहीं है.

वास्तव में पूरा प्रशासन कोविड के संकट से जूझ रहा है. फिर भी मुख्यमंत्री को चव्हाण-थोरात की बात सुन ही लेनी चाहिए क्योंकि सरकार का तीसरा पैर कांग्रेस का है. राज्यपाल द्वारा नियुक्त 12 विधान परिषद सीटों के समान वितरण का मुद्दा है. वो मामला कुलबुलाहट या कुरकुर का नहीं है. विधानसभा में कांग्रेस विधायकों की संख्या 44, शिवसेना 56 और अन्य सहयोगी दलों के साथ 64 और राष्ट्रवादी कांग्रेस के 54. इसलिए इसी अनुपात में आवंटन होने में कोई समस्या नहीं है. शिवसेना ने सत्ता के वितरण में सबसे बड़ा त्याग किया है.

कांग्रेस-राकांपा ने विधानसभा अध्यक्ष के पद पर विवाद शुरू किया. शरद पवार थोड़ा नाराज हुए, तो उन्होंने यह कहकर विवाद सुलझा दिया कि कांग्रेस विधानसभा अध्यक्ष पद ले ले और बदले में शिवसेना अपने हिस्से का एक कैबिनेट मंत्री का पद राष्ट्रवादी को दे, इस पर मामला सुलझ गया. कांग्रेस के राज्यमंत्रियों का प्रमोशन करके दो कैबिनेट दिए. समान सत्ता वितरण में भी हिस्से में इतना नहीं आता. लेकिन मुख्यमंत्री ने बेझिझक होकर सब दिया और इसके बाद 6 महीने किसी की खाट में कुरकुर की आवाज नहीं हुई.

तबादले, प्रमोशन, पसंदीदा सचिव, यह नहीं चाहिए वगैरह यह सब सरकार में हमेशा चलता रहता है. इस खेल में पत्तों का पिसना कभी नहीं थमता. इसलिए सरकार को खतरा पैदा होगा और राजभवन के दरवाजे किसी के लिए अल-सुबह फिर से खुल जाएंगे, इस भ्रम में कोई न रहे. चाहे कांग्रेस हो या राकांपा, राजनीति में मंझे लोगों की पार्टी है. उन्हें इस बात का अनुभव है कि कब और कितना कुरकुराना है, कब करवट को बदलना है.

उद्धव ठाकरे को सत्ता का लोभ नहीं. राजनीति अंततः सत्ता के लिए ही है और किसी को सत्ता नहीं चाहिए, ऐसा नहीं है लेकिन उद्धव ठाकरे ऐसे नेता नहीं हैं, जो सत्ता के लिए कुछ भी करेंगे. हर किसी के गले में मंत्री पद का हार है. यह नहीं भुलाया जा सकता कि इसमें शिवसेना का त्याग भी महत्वपूर्ण है. खाट कितनी भी क्यों न कुरकुराए, कोई चिंता न करे, बस इतना ही कहना है.”

 

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