सिर पर किलो किलो पत्थर और गोद में चंद माह का मासूम, ऐसी है एक पीसीएस की दिल छू लेने वाली कहानी

ये पंक्तियाँ हूबहू पद्मशीला तिरपुड़े (Padmashila Tirupade) पर साकार होती है। सिर पर किलो किलो के पत्थर और  गोद में चंद माह का मासूम और आंचल से ढका उसका मुंह, माथे पर उड़ती उसकी लटों के साथ बहता पसीना ये भाव है पद्मशीला तिरपुड़े के …..जो माथे पर बहते पसीने को पोछना तो चाहती है पर उसके हाथों में दो जिम्मेदारियां एक हाथ में पत्थर और दूसरे में उसका मासूम बच्चा उस तक पहुंचने नहीं देती।

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है

ये पंक्तियाँ हूबहू पद्मशीला तिरपुड़े (Padmashila Tirupade) पर साकार होती है। सिर पर किलो किलो के पत्थर और  गोद में चंद माह का मासूम और आंचल से ढका उसका मुंह, माथे पर उड़ती उसकी लटों के साथ बहता पसीना ये भाव है पद्मशीला तिरपुड़े के …..जो माथे पर बहते पसीने को पोछना तो चाहती है पर उसके हाथों में दो जिम्मेदारियां एक हाथ में पत्थर और दूसरे में उसका मासूम बच्चा उस तक पहुंचने नहीं देती। इससे पद्मशीला तिरपुड़े की  दिमाग में तस्वीर सी उकेर जाती है। 

घर चलाने के रोजो रोटी की जुगत में लगी रही

जो अपने हौसलों से अपनी किस्मत को बदलने के लिए पत्थर पर उकेरती है। इसी एक कोशिश में जुटी है भंडारा ज़िले की रहने वाली पद्मशीला तिरपुड़े। इन्होंने प्रेम विवाह किया है। जब देखा पति के घर के हालात उन्हें कुछ करना चाहिए।

महाराष्ट्र राज्य से PSC में पी.एस.आई की परीक्षा पास होने के बावजूद उन्होंने घर की जिम्मेदारी उठाने के लिए काम को छोटा बड़ा सोचे बिना उन्होंने खलबत्ता और पत्थर के सिलबट्टे बेचने से भी परहेज नही किया। एक तरफ गोद में एक शिशु को भी लिए हुए अपनी जिम्मेदारी का पूर्ण निर्वहन  और दूसरी तरफ घर चलाने के रोजो रोटी की जुगत में लगी रही ।

उनकी मेहनत को हमारा सैल्यूट है

इस महिला ने यशवंतराव चव्हाण मुक्त विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की।  साथ ही महाराष्ट्र राज्य से PSC में  पी.एस.आई की परीक्षा उत्तीर्ण की है। वे बौद्ध परिवार से आती हैं। इनकी कार्य क्षमता और हौसले को जितना भी सराहा जाए कम है। उनकी मेहनत को हमारा सैल्यूट है।

शिक्षा में परिस्थिति व्यवधान नहीं बनती, बल्कि परिस्थिति केवल बहाना होती है। इस महिला ने ये साबित कर दिखाया कि हम किसी भी परिस्थिति में हों हमें अपना हौसला और हिम्मत नही खोना चाहिए।  साथ ही काम कैसा भी हो उसे पूरी लगन व ईमानदारी से करते रहना ही जीवन है ।

दोनों ने कुछ नहीं खाया रात भर सिर्फ ये ही सोचते रहे की

दस साल पहले भंडारा जिले के वाकेश्वर के पास के ही गांव के तुकाराम खोब्रागडे से प्रेम विवाह करने वाली पद्मशीला बताती है की शुरुवाती दिनों में दोनों पति पत्नी मजदूरी करके जीवन यापन कर रहे थे। जितना कमाते उतना दिन भर के जीवन यापन के लिए पर्याप्त था। लेकिन एक दिन उसके पति को  मजदूरी में मिले 50 रूपए कहीं खो गए और वो दिन इनके लिए बहुत दुःख भरे बीते उस दिन दोनों ने कुछ नहीं खाया रात भर सिर्फ ये ही सोचते रहे की।

कैसे ज़िंदगी चलेगी और फिर पति ने ये तय किया की कुछ भी हो वो अपनी पत्नी की  आगे की पढ़ाई जारी रखेंगे। इस बीच सिलबट्टे और फल बेचते  पद्मशीला ने स्नातक पूरा किया और एमपीएसी का एग्जाम क्लियर करने के बाद  आज पुलिस उपनिरीक्षक हैं.पद्मशीला आज उन सभी महिलाओ के लिए प्रेरणा है जो थोड़ी सी विपरीत परिस्थिति  में हार माना लेती है।

 

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